डॉ अनूपा कुमारी सत्य – असत्य के बीच उधेड़-बुन में उलझा मानव कभी दिल तो कभी दिमाग से बहुत कुछ सोचता है सोचता ही रहता है किन्तु परिणाम तक नहीं पहुंच पाता…
प्रतिमा सिंह, मऊ हां मैं बोल जाती हूं ज्यादा कभी-कभी, क्योंकि मैं खुद को संभालना नहीं जानती। हां मैं कर जाती हूं नादानियां कभी-कभी क्योंकि मैं समझना नहीं जानती। हां मैं बन…
बृजेश गिरि बावफा होने से अच्छा है बेवफा होना, बहुत मुश्किल है इस जमाने में अच्छा होना कैसे-कैसे लोगों को मिल गई मंजिलें, मेरी किस्मत में लिखा है तुझसे जुदा होना। आज…
वरिष्ठ साहित्यकार, एसो. प्रोफेसर राजकीय कला पीजी कॉलेज, अलवर शहर हो या देहात में औरत जीवन की हर बात में औरत टूटी छत की चिंताएँ ले छत पर है बरसात में औरत…
आनंद कुमार सच में कितना प्यारा था मेरे नानी का घर… चापा कल से, पानी का भरना नदी में जाकर, छप्प-छप्प नहाना बगीचे में जाकर, शरीफा को खाना, आम के पेड़ पर,…
अभिनेता, रंगकर्मी, निर्देशक, लेखक श्री अविनाश पाण्डेय जी की ग़ज़ल बेकरार दिल है ये, ढूँढता करार है है किधर सुकूं पड़ा, उलझने हज़ार हैं… बेसबब से अश्क क्यूँ, कर रहे हैं चश्मेनम…