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Category: सोंधी मिटटी

कविता : सत्य -असत्य के बीच

Posted on September 5, 2023

डॉ अनूपा कुमारी सत्य – असत्य के बीच उधेड़-बुन में उलझा मानव कभी दिल तो कभी दिमाग से बहुत कुछ सोचता है सोचता ही रहता है किन्तु परिणाम तक नहीं पहुंच पाता…

कविता: मैं ऐसी ही हूं

Posted on September 5, 2023

प्रतिमा सिंह, मऊ हां मैं बोल जाती हूं ज्यादा कभी-कभी, क्योंकि मैं खुद को संभालना नहीं जानती। हां मैं कर जाती हूं नादानियां कभी-कभी क्योंकि मैं समझना नहीं जानती। हां मैं बन…

कविता : धरती के आइने में चांद

Posted on September 5, 2023

डॉ धनञ्जय शर्मा, असिस्टेंट प्रोफेसर सर्वोदय पी.जी. कॉलेज, घोसी, मऊ धरती के आइने में,असंख्य रश्मियां बिखेरतासतमी का बांका चांदउतर रहा जमीं पर दूधिया रोशनी फैलाते। श्वेत-श्याम अस्पष्ट चेहरों परप्रश्नांकुल निगाहों में घिरा,सन्…

कविता – लकड़हारा

Posted on August 4, 2023

कवि – घनश्याम कुमार युवा कवि पलामू झारखंड भला इस मानुस के बारे में कौन सोचेगा जो अतीत के गर्त से भविष्य के द्वार पर आ खड़ा है वही लकड़ी  के टुकड़े…

ग़ज़ल

Posted on August 4, 2023

बृजेश गिरि बावफा होने से अच्छा है बेवफा होना, बहुत मुश्किल है इस जमाने में अच्छा होना कैसे-कैसे लोगों को मिल गई मंजिलें, मेरी किस्मत में लिखा है तुझसे जुदा होना। आज…

कजरी : पपिहा कहे पियु हमसे ना कहात बा

Posted on August 4, 2023

कवि – अविनाश पाण्डेय पपिहा कहे पियु हमसे ना कहात बा कजरी गवात बा ना! पड़े रिमझिम फुहार, डोले अमवा क डार केहू झुलवा झुलाए, ई जोहात बा कजरी गवात बा ना!…

ग़ज़ल : प्रख्यात ग़ज़लकार श्री विनय मिश्र जी

Posted on July 1, 2023

वरिष्ठ साहित्यकार, एसो. प्रोफेसर राजकीय कला पीजी कॉलेज, अलवर शहर हो या देहात में औरत जीवन की हर बात में औरत टूटी छत की चिंताएँ ले छत पर है बरसात में औरत…

कविता – नानी का घर…

Posted on July 1, 2023

आनंद कुमार सच में कितना प्यारा था मेरे नानी का घर… चापा कल से, पानी का भरना नदी में जाकर, छप्प-छप्प नहाना बगीचे में जाकर, शरीफा को खाना, आम के पेड़ पर,…

गांव बोलता नहीं, चुप रहता है अब

Posted on July 1, 2023

डॉ.सौरभ श्रीवास्तव बरगद का वो पेड़ जिसकी जड़ें फैली थी चारों तरफ वर्षों से वो भी चुप है, गायों का झुंड भी अब शांत है गांव के बगल से जो नदी गुजरती…

ग़ज़ल © श्री अविनाश पाण्डेय जी, वाराणसी

Posted on May 31, 2023

अभिनेता, रंगकर्मी, निर्देशक, लेखक श्री अविनाश पाण्डेय जी की ग़ज़ल बेकरार दिल है ये, ढूँढता करार है है किधर सुकूं पड़ा, उलझने हज़ार हैं… बेसबब से अश्क क्यूँ, कर रहे हैं चश्मेनम…

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