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कविता – भागती लड़कियाँ

Posted on July 4, 2026

रोमिता शर्मा

कुन्हों, करसोग,जिला मण्डी,

हिमाचल प्रदेश

मुझे अच्छी लगती हैं भागती हुई लड़कियां

सपनों को पूरा करने

गांव की कच्ची मिट्टी से

शहर की पक्की सड़कों पर दौड़ लगाती लड़कियां ।

सब दौड़कर छूना चाह रहीं है

चौकन्नी आंखों में बुने सपनों को

अपनी- अपनी दौड़ में

कुछ धीरे, कुछ तेज, कुछ कदमों में बांधती

जिम्मेदारियों के पहाड़ों को लांघते हुए

सपनों की लड़ाई में

मुंह अंधेरे, सर्द भरे मौसम में

किसी सरकारी स्कूल के धूल भरे ग्राउंड में

अपने सपनों के पीछे

हजारों चक्र लगाती नज़र आ रहीं है लड़कियां ।

आखों में एक चमक, शरीर में थकान

कंपकंपी देह लेकर अपनी गति सीमा

देखते-देखते भाग रही हैं

इस उम्मीद से कि

शायद किसी सपने को छू लेंगी ।

यह दौड़ एक अभ्यास नहीं

बल्कि पूर्वाभ्यास है

समय से जुड़कर चलने का तरीका

जबकि ना समय, ना सपना कहीं ठहरता है

एक विश्वास है लंबी दौड़ में

सब को पछाड़ने का

हजार फब्तियों को सहकर

लड़कियां इतनी जिद्दी हैं

कि रूकने का नाम ही नहीं लेती

कभी मां की तल्खियां, कभी बाबा की रुसवाई

घर से साथ ढ़ोती बिखरे हुए घर की नियति

निश्चित भाड़े की शर्त पर,

कोई कमरा

करता है इन लड़ाइयों की पैरवी

अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगा कर

उपहास का पात्र बन फिर से सपनों को देखती

अपने सपनों की लड़ाई में व्यस्त रहती लड़कियां ।

कर रही है विज्ञान,गणित, रसायन के समीकरण हल

पढ़ती हैं कला,साहित्य और भौतिक शास्त्र

पढ़ाई के साथ अपनी अस्मिता हेतु

पीठ पर सपने ढो रही हैं

हर पल दौड़ती भागती लड़कियां ।

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