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धुरंधर फिल्म : सफलता और विवाद

Posted on July 5, 2026

डॉ. सुधांशु लाल

नाट्यकर्मी एवं

फिल्म समीक्षक, लखनऊ

भारतीय सिनेमा में समय-समय पर ऐसी फिल्में आती रही हैं जो केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहतीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक बहसों का केंद्र बन जाती हैं। दो बीघा ज़म्में, अर्ध सत्य, गरम हवा, मंदी, तामस से लेकर बैंडिट क्वीन तक ऐसी ही फ़िल्में रही जो सिर्फ व्यवसायिक न हो कर समाज के अलग अलग मुद्दों को उठती रहीं हैं. ये कहना  गलत होगा की आज के समय ऐसी फ़िल्में नहीं बन रही हैं आर्टिकल 15, जय भीम, फंद्री , मसान जैसी फिमे आज के युग में भी सामाजिक हकीकत को दिखा रही हैं. ऐसा नहीं है की सामजिक और राजनीतिक मुद्दों पे बनायीं गयी फ़िल्में सिर्फ एक खास वर्ग के दर्शोकं को ही पसंद आती हैं  बल्कि ऐसे कई उदाहरण है जहाँ सामजिक और  राजनातिक मुद्दों पे बनी फिल्मे व्यावसायिक रूप से भी काफी सफल रही हैं, स्वदेश, लगान , दंगल, pk, तारे  ज़मीन  पर, रंग दे बसंती जैसी फ़िल्में व्यावसायिक रूप से भी उतनी  ही सफल रहीं जीतनी की अन्य मसाला फ़िल्में. इसी कड़ी में  “धुरंधर” ऐसी ही एक फिल्म मानी जा सकती है जिसने अपनी रिलीज़ के साथ ही दर्शकों, समीक्षकों और सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाओं को जन्म दिया। यह फिल्म अपनी कहानी, प्रस्तुति, हिंसा के चित्रण, और व्यावसायिक सफलता के कारण व्यापक चर्चा का विषय बनी।

फिल्म उद्योग केवल कला का माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक विशाल आर्थिक गतिविधि भी है। आज कल  किसी भी फिल्म की वास्तविक सफलता का आकलन उसके बॉक्स ऑफिस कलेक्शन, निर्माण लागत, मार्केटिंग रणनीति, डिजिटल अधिकार, सैटेलाइट राइट्स और दर्शकों की मांग से किया जाता है। “धुरंधर” ऐसी फिल्म के रूप में देखी जा सकती है जिसने न केवल दर्शकों का ध्यान खींचा, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। “धुरंधर” ने बॉक्स ऑफिस पर उल्लेखनीय कमाई की और कम समय में ही बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल की।फिल्म में भव्य एक्शन दृश्य, बड़े सेट, तकनीकी गुणवत्ता और स्टार कास्ट के कारण इसका बजट अपेक्षाकृत अधिक रहा। बड़े बजट की फिल्मों में जोखिम भी अधिक होता है, इसलिए उनकी मार्केटिंग रणनीति भी आक्रामक होती है। फिल्म की मार्केटिंग रणनीति, ट्रेलर की उत्तेजक प्रस्तुति, और विवादों के कारण पैदा हुई जिज्ञासा ने दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचा। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया ट्रेंड और मीम संस्कृति भी फिल्म की लोकप्रियता का बड़ा कारण बने।फिल्म के संवाद, एक्शन दृश्य और नायक की सशक्त छवि युवाओं के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुई। इस प्रकार फिल्म ने यह साबित किया कि विवाद और चर्चा भी कभी-कभी फिल्म की कमाई का साधन बन जाते हैं।

 फिल्म से जुड़े विवाद

फिल्म के कुछ दृश्यों में अत्यधिक हिंसा, आक्रामक संवाद और सामाजिक समूहों के चित्रण को लेकर कई विवाद सामने आए। कुछ लोगों ने इसे समाज में हिंसा को बढ़ावा देने वाला बताया, जबकि कुछ ने इसे यथार्थवादी प्रस्तुति कहा।सोशल मीडिया पर फिल्म को लेकर दो धड़े बन गए—एक पक्ष इसे साहसिक और वास्तविकता के निकट मानता है, जबकि दूसरा पक्ष इसे गैर-जिम्मेदाराना और समाज के लिए हानिकारक बताता है। कुछ समीक्षकों ने यह भी कहा कि फिल्म ने सनसनीखेज प्रस्तुति के लिए संवेदनशील मुद्दों का उपयोग किया।

हालांकि ये विवाद भी नया नहीं और सिर्फ फिल्मों तक सिमित नहीं है की कला  के नाम पे कितना  यथार्थवादी  चित्रण हो सकता है चाहे वो साहित्य हो, पेंटिंग हो, मूर्ति कला हो , गीत हो, कविता हो या फिर फ़िल्में हो. विवाद सिर्फ यथार्द्वादी चित्रण पे नहीं  बल्कि अश्लीलता और कलात्मकता पर भी  रहा है की कैसे और कौन निर्धारित करेगा की कोई दृश्य, साहित्य या अन्य कला अश्लील है या कलातमक सृजनता और अलग अलग समाज में अलग अलग चीज़ें प्रतिबंधित होती हैं और उनमे से बहुत सीऐसी चीज़ें हैं जो एक समाज  में तो सहज रूप से ली जाती है किन्तु दुसरे समाज के लिए अश्लील या असहज हों । ये बहस बहुत व्यापक है इसे पर चर्चा और उद्धरण किसी और लेख में करेंगे ।

तो आईये हम देखते हैं समीक्षात्मक दृष्टि से “धुरंधर”  फिल्म के  सकारात्मक और नकारात्मक  पहलू । धुरंधर व्यावसायिक रूप से काफी सफल होने के बावजूद एक मिश्रित प्रतिक्रिया प्राप्त करने वाली फिल्म है।“धुरंधर” को लेकर मीम, ट्रोल, रिव्यू और बहसों की बाढ़ आ गई। कुछ दर्शकों ने इसे ‘मास एंटरटेनर’ कहा तो कुछ ने इसे ‘हिंसा का महिमामंडन’ बताया ।

सकारात्मक पक्ष: फिल्म में कलाकरों का अभिनय सशक्त और संवाद प्रभावशाली रहा है । हालांकि फिल्म का नायक अत्यंत शक्तिशाली और आक्रामक रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह ‘मास हीरो’ की छवि को मजबूत करता है, लेकिन उसे मानवीय कमजोरियों या संवेदनाओं के साथ कम दिखाया गया है। जबकि अगर इसकी तुलना पठान  या गदर 2 के  नायक के साथ करें तो इनके नायक भावनात्मक और पारिवारिक आयाम से भी जुड़े हैं, जो उन्हें अधिक मानवीय बनाते हैं।

फिल्म छायांकन और एक्शन दृश्यों की तकनीकी उत्कृष्टता को दिखाती है, “धुरंधर” की सबसे बड़ी ताकत इसका छायांकन और एक्शन दृश्यों की भव्यता है। कैमरा एंगल, बैकग्राउंड स्कोर और एडिटिंग दर्शकों को रोमांचित करते हैं। यह पहलू KGF से मिलता-जुलता है, जहाँ दृश्यात्मक प्रभाव फिल्म का प्रमुख आकर्षण था।

कहानी में रोमांच और गति पर धयान दिया गया है,  “धुरंधर” की कहानी तेज गति और एक्शन प्रधान है। फिल्म दर्शकों को शुरू से अंत तक बांधे रखने की कोशिश करती है, और काफी हद तक ये सफल भी रहती है, लेकिन कहानी की गहराई और पात्रों के मनोवैज्ञानिक विकास पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है. इसके विपरीत, KGF और पुष्पा जैसी फिल्मों में एक्शन के साथ-साथ पात्रों का विकास और पृष्ठभूमि विस्तार से दिखाया गया, जिससे दर्शकों का भावनात्मक जुड़ाव बढ़ा।

निर्देशन में नाटकीय प्रभाव है जो कि सिनेमा की आवश्यकता भी होती है फिर भी फिल्म में हिंसा और आक्रामकता का प्रयोग अधिक है। यह दर्शकों को रोमांचित करता है, परंतु कलात्मक संतुलन की दृष्टि से यह कुछ दर्शकों को असहज भी कर सकता है। इसके विपरीत, अन्य हिट फिल्मों में एक्शन के साथ भावनात्मक और सामाजिक संदेश भी समाहित होते हैं। इस फिल्म में भी राष्ट्रवाद को प्रेरित करने की कोशिश की गयी है किन्तु एक सनसनी के जरिये ।

नकारात्मक पक्ष पहला तो अनावश्यक हिंसा का अत्यधिक प्रयोग, दूसरा सामाजिक मुद्दों की सतही प्रस्तुति, कुछ पात्रों का एकांगी चित्रण तथा मनोरंजन के नाम पर संवेदनशीलता की कमी। फिल्म यह प्रश्न भी उठाती है कि क्या व्यावसायिक सफलता के लिए फिल्मकार सामाजिक जिम्मेदारी से समझौता कर सकते हैं? इस फिल्म को उस केटेगरी में नहीं रख सकते जहाँ सिर्फ व्यावसायिक सफलता के लिए निर्माता और निर्देशक फिल्म की कलात्मकता और सामाजिक ज़िम्मेदारी से समझौता करते हैं । इस फिल्म में निर्माता और निदेशक का अपनी कला को रखने का तरीका कुछ अलग है ।

 निष्कर्ष और सुझाव

“धुरंधर” एक ऐसी फिल्म है जो यह दिखाती है कि सिनेमा केवल कला नहीं, बल्कि एक व्यापार भी है। फिल्म की सफलता यह दर्शाती है कि दर्शक रोमांच और एक्शन को पसंद करते हैं, परंतु विवाद यह संकेत देते हैं कि समाज फिल्मों से एक नैतिक जिम्मेदारी की भी अपेक्षा करता है।
मनोरंजन और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। हिंसा और विवाद के माध्यम से ध्यान आकर्षित करने के बजाय कहानी की गहराई पर ध्यान देना चाहिए।

अंततः, “धुरंधर” केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय सिनेमा में व्यावसायिकता, विवाद और दर्शकों की मानसिकता का प्रतिबिंब बनकर उभरी है।

आर्थिक दृष्टि से “धुरंधर” एक सफल फिल्म कही जा सकती है, क्योंकि इसने अपने बजट से अधिक कमाई की और कई माध्यमों से राजस्व अर्जित किया। परंतु जब इसकी तुलना अन्य बड़ी हिट फिल्मों से की जाती है, तो यह स्पष्ट होता है कि स्थायी सफलता के लिए केवल एक्शन और विवाद नहीं, बल्कि मजबूत कहानी, भावनात्मक जुड़ाव और व्यापक दर्शक वर्ग की आवश्यकता होती है।

इस प्रकार, “धुरंधर” आधुनिक सिनेमा में उस प्रवृत्ति का उदाहरण है जहाँ आर्थिक सफलता के लिए मार्केटिंग, विवाद और सोशल मीडिया उतने ही महत्वपूर्ण हो गए हैं जितनी फिल्म की कहानी।सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि एक कला है जिसमें कहानी, अभिनय, छायांकन, संगीत, संपादन और निर्देशन जैसे तत्व मिलकर एक समग्र अनुभव रचते हैं। “धुरंधर” को यदि कलात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह फिल्म दर्शकों को तीव्र भावनात्मक और दृश्यात्मक अनुभव देती है, परंतु इसके साथ कुछ कलात्मक सीमाएँ भी सामने आती हैं।

कलात्मक दृष्टि से “धुरंधर” एक दृश्यात्मक रूप से प्रभावशाली और तकनीकी रूप से सशक्त फिल्म है, जो एक्शन और संवाद के माध्यम से दर्शकों को आकर्षित करती है। “धुरंधर” एक प्रभावशाली ‘मास एंटरटेनर’ है, परंतु ‘क्लासिक सिनेमा’ की श्रेणी में आने के लिए उसे कलात्मक परिपक्वता की और आवश्यकता प्रतीत होती है।

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