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Vithika April 2024

Posted on April 9, 2024

डॉ एस.पी सती और सतोपंथ हिमानी

Posted on March 21, 2024

पर्यावरणविद, उत्तराखंड प्रसिद्ध पर्यावरणविद डॉ एस.पी.सती जी पर्यावरण के हर पहलु को अपनी नज़र से देखते हैं. ऋषि मनीषी हैं सरल स्वभाव वाले डॉ सती जी जब हिमालय की गोद में होते…

लोक कथा – जलांध

Posted on March 20, 2024

गीता कैरोला उत्तराखंड चौमासा हमेशा त्योहांरों की आमद के साथ बीतता है।श्राद्ध के पंद्रह दिनों में पितृ पूरे साल का भोजन जीम ने के साथ साल भर का राशन बांध कर विदा…

‘अज्ञेय की काव्य-यात्रा’

Posted on March 20, 2024

बृजेश गिरि प्रवक्ता, जैश किसान इन्टर कॉलेज घोसी, मऊ सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन’अज्ञेय’ प्रयोगवाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। वैसे नयी कविता को भी साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने श्रेय अज्ञेय को ही…

तारसप्तक में प्रयोगवाद की अवधारणा

Posted on March 20, 2024

डॉ धनञ्जय शर्मा असिस्टेंट प्रोफेसर, सर्वोदय पी.जी.कॉलेज घोसी, मऊ अज्ञेय द्वारा संपादित सन 1943 में तार सप्तक आधुनिक हिन्दी काव्य के इतिहास में एक मील का पत्थर है। परवर्ती छायावादी कविता और…

अज्ञेय का काव्यभाषा सम्बन्धी चिन्तन

Posted on March 20, 2024

डॉ. नितिन सेठी, बरेली अज्ञेय भावुक कवि होने के साथ-साथ एक गहन चिंतक और विचारक के रूप में भी हमारे समक्ष आते हैं। अज्ञेय ने समय-समय पर सामान्य भाषा और काव्यभाषा; इन…

भाषा वैशिष्ट्य और अज्ञेय

Posted on March 20, 2024

प्रियंवदा पाण्डेय देवरिया उत्तर प्रदेश युग प्रवर्तक अज्ञेय को भला कौन नहीं जानता है। अपनी लेखनी से उन्होंने नवीन प्रतिमान तो स्थापित किए ही साथ ही एक नई शैली और नई विचारधारा…

अज्ञेय की जीवंतता और सजगता का दस्तावेज़ : भवंती, अन्तर और शाश्वती

Posted on March 20, 2024

डॉ. दिलीप शर्मा, प्राक्तन उप प्राचार्य, नगाँव कालेज नगाँव : असम अज्ञेय मूलतः एक लेखक हैं, दार्शनिक नहीं, समस्याएं चाहें एक सी हों कवि के चिंतन के औजार, सोचने का ढंग, विचारों…

‘हरी घास पर क्षण भर’

Posted on March 20, 2024

प्रो. विवेक कुमार मिश्र प्रोफेसर – हिंदी विभाग राजकीय कला महाविद्यालय कोटा आओ बैठेंइसी ढाल की हरी घास पर।माली-चौकीदारों का यह समय नहीं है,और घास तो अधुनातन मानव-मन की भावना की तरहसदा…

अज्ञेय के गद्य को पढ़ते हुए…….

Posted on March 12, 2024

विमलेश कुमार मिश्र आचार्य,हिन्दी विभाग दी.द.उ. गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर अज्ञेय तो अनेक हैं, मैं किस अज्ञेय की बात करूँ। क्या हिन्दी की कोई ऐसी परम्परा है, जिससे अज्ञेय जुड़ते हैं। हिन्दी में…

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