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Category: सोंधी मिटटी

कविता – लकड़हारा

Posted on August 4, 2023

कवि – घनश्याम कुमार युवा कवि पलामू झारखंड भला इस मानुस के बारे में कौन सोचेगा जो अतीत के गर्त से भविष्य के द्वार पर आ खड़ा है वही लकड़ी  के टुकड़े…

ग़ज़ल

Posted on August 4, 2023

बृजेश गिरि बावफा होने से अच्छा है बेवफा होना, बहुत मुश्किल है इस जमाने में अच्छा होना कैसे-कैसे लोगों को मिल गई मंजिलें, मेरी किस्मत में लिखा है तुझसे जुदा होना। आज…

कजरी : पपिहा कहे पियु हमसे ना कहात बा

Posted on August 4, 2023

कवि – अविनाश पाण्डेय पपिहा कहे पियु हमसे ना कहात बा कजरी गवात बा ना! पड़े रिमझिम फुहार, डोले अमवा क डार केहू झुलवा झुलाए, ई जोहात बा कजरी गवात बा ना!…

ग़ज़ल : प्रख्यात ग़ज़लकार श्री विनय मिश्र जी

Posted on July 1, 2023

वरिष्ठ साहित्यकार, एसो. प्रोफेसर राजकीय कला पीजी कॉलेज, अलवर शहर हो या देहात में औरत जीवन की हर बात में औरत टूटी छत की चिंताएँ ले छत पर है बरसात में औरत…

कविता – नानी का घर…

Posted on July 1, 2023

आनंद कुमार सच में कितना प्यारा था मेरे नानी का घर… चापा कल से, पानी का भरना नदी में जाकर, छप्प-छप्प नहाना बगीचे में जाकर, शरीफा को खाना, आम के पेड़ पर,…

गांव बोलता नहीं, चुप रहता है अब

Posted on July 1, 2023

डॉ.सौरभ श्रीवास्तव बरगद का वो पेड़ जिसकी जड़ें फैली थी चारों तरफ वर्षों से वो भी चुप है, गायों का झुंड भी अब शांत है गांव के बगल से जो नदी गुजरती…

ग़ज़ल © श्री अविनाश पाण्डेय जी, वाराणसी

Posted on May 31, 2023

अभिनेता, रंगकर्मी, निर्देशक, लेखक श्री अविनाश पाण्डेय जी की ग़ज़ल बेकरार दिल है ये, ढूँढता करार है है किधर सुकूं पड़ा, उलझने हज़ार हैं… बेसबब से अश्क क्यूँ, कर रहे हैं चश्मेनम…

क्यूँ रंगती हूँ © श्रीमती अनूप कटारिया, जयपुर, राजस्थान

Posted on May 31, 2023

मन के सांकल खटखटाती श्रीमती अनूप कटारिया जी की कविता – ” क्यूँ रंगती हूँ” क्यूँ रंगती हूँ मैँ इन डायरी के पन्नों को कौन देखेगा इन इन्द्रधनुषी रंगों को सब रंगहीन…

युद्ध © नमिता राकेश

Posted on May 31, 2023

(प्रसिद्ध कवियित्री श्रीमती नमिता राकेश जी, दिल्ली की कविता- “युद्ध” ) युद्ध लड़ना और जीतना दो देशों या कुछ देशों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न हो सकता है, लेकिन युद्ध करना इतना…

कविता का जन्म

Posted on May 27, 2023

एक कविता जन्म लेती है खेत मे फसल लहलहाने पर। एक कविता जन्म लेती है, बाग में फूल मुरझाने पर। कविताओं का जन्म निरन्तर होता रहता है हर क्षण,हर युग में। हर…

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