चित्रा मोहन

प्रसिद्ध नाट्य निर्देशिका, लखनऊ
आजकल युवा पीढ़ी की प्रेम कहानियों का, रवींद्र कालिया द्वारा संपादित संकलन पढ़ते हुए आनंद चौगुना बढ़ता चला जाता है।
वैसे देखा जाए तो इश्क़े हक़ीक़ी का प्रयोग ईश्वर प्रेम और इश्क़े मजाज़ी का सांसारिक प्रेम के लिए होता है। महानगरों में, प्रेम की परिकल्पना में तेज़ी से बदलाव आया है। यहां प्रेम करियर की सीढ़ी है। इसीलिए यहां इश्क़े हक़ीक़ी वाली बात नहीं जो लग जाए तो घुन की तरह खाए जाए,बल्कि भौंरे की तरह जिधर रस नज़र आए उधर ही मुड़ जाता है,एकदम दिलफेंक होता है। नई पीढ़ी प्रेम के बारे में क्या सोचती है,इसकी झलक इस पुस्तक के संकलन में चुनी कहानियों में स्पष्ट दिखती है। पंकज मित्र की कहानी,“पप्पू कांट लव सा…”, मनोज कुमार पाण्डेय की “ और हंसो लड़की”, राहुल सिंह की “नहीं,तो,मतलब,लेकिन हां” प्रियदर्शन मालवीय की “प्रेम न हाट बिकाय”,कुणाल सिंह की “ प्रेम कथा में मोजे की भूमिका,आदि अनेक कहानियों में नई दृष्टि मिलती है। पप्पू कांट लव, लव जिहाद की परिधि में एकतरफा प्रेम की परिणिति है, पीटे जाते पप्पू से भीड़ का कहना……“प्रणाम पप्पू जी बोलिए जय हिंद
पप्पू–जय हिंद
भीड़– बोलिए भारत माता की जय
पप्पू,–,भारत माता की जय
भीड़– चलिए, शर्मा जी ने बुलाया है आपको,वहां स्कूल के पीछे वाले मैदान में।
पप्पू–हां हां चलिए
एक लड़के के पीछे बाइक पर उचक कर बैठ गए पप्पू,तरह तरह की संभावनाओं से मन हुमक रहा था…“जरूर सुवी शर्मा आई होगी,उसी ने बुलवाया होगा”,…..पर वहां पहुंच कर ताज्जुब में पड़ गए,कोई नहीं था, निपट सुनसान,उन्हें हैरानी हो रही थी,लड़कों का घेरा उनके चारों ओर कसता क्यों जा रहा था?
कहां है शर्मा अंकल?
आयेंगे-आयेंगे
और पप्पू जी ये गुलाब के फूल?
वो आज वेलेंटाइन डे है न इसलिए
सड़ाक….. चेन लगी थी टांगों पर
“पप्पू की बॉडी फाइन है रग रग तोड़ दो साले की,
तड़ाक,सिर पर डंडा पड़ा था।,पप्पू का तेज़ माइंड है..
बहते खून से आंखे झिपने से पहले सुनाई दिया…..
“फिदायीन है ये …रक्त प्रदूषित कर देंगे हमारा…
पप्पू गिर चुके थे,लड़के हंस रहे थे…“बट पप्पू कांट लव साला,….
पप्पू के बदन ऐंठ रहा था किंतु उनकी मुट्ठी में भिंचा एक छोटा सा कार्ड लहरा रहा था,जिसे इतने घाव लगने के बाद भी उन्होंने नहीं छोड़ा था, उस पर लिखा था…..“सुवी शर्मा,आई आई टी मुंबई..और एक कोने
में लिखा था“विथ लव ..,पप्पू”
दूसरी कहानी “राहुल सिंह की, नहीं तो मतलब हां” एक और रंग दिखाती है जहां प्रेम का दर्शन भी प्रत्यक्ष दिखते हुए स्वप्न में बदल जाता है। ये कथा शिल्प का अनूठा प्रयोग है।
“अब बता ही दो,पूछ रही हूं
मैं तुम्हारे प्रति लापरवाह रहा।
लेकिन मैं यहां हूँ,क्योंकि मैं तुम्हारी परवाह करती हूं।
तुम्हे मालूम है कि मैं अब तक क्यों अकेला रहा?
क्योंकि किसी को प्रपोज़ करने की हिम्मत ही नहीं थी।
”नहीं,क्योंकि जो मुझसे बेहतर थीं उन्होंने मेरी तरफ़ कभी पलटकर भी नहीं देखा और मैं जिनसे बेहतर था,उनकी तरफ़ मैने कभी मुड़ कर नहीं देखा।”
“मतलब मौके के अभाव में ब्रम्हचारी बने बैठे थे?”
“कुछ ऐसा ही समझो”
“तो सबसे पहले मुझे इस बूढ़े बाघ के कंगन छीनने होंगे,?”
“अब इस बाघ का आभूषण तुम हो”
“सच में?”
“नहीं,झूठ में”
मज़ाक मत करो”
“मैं सीरियस हूँ”
“पीटूंगी तुम्हें”
“क्यों?
“क्योंकि प्यार आ रहा है”
(रोहन कहां है जी……)
“यह प्यार जताने का कौन सा तरीका है?”
(कब इसकी आदतें सुधरेंगी?)
“तो मैं अपना तरीका बताता हूँ, ज़रा अपने होंठों को मेरे नज़दीक़ आने दो…”
(रोहन अब उठो भी,दस बज गए, दुकान का शटर भी उठाना है। पता नहीं बेटा,तुम्हारी ज़िन्दगी कैसे चलेगी?)
“क्या पापा,दो मिनट बाद नहीं जगा सकते थे?अच्छी भली जिंदगी शुरू कर रहा था…..।
प्रियदर्शन मालवीय की“प्रेम न हाट बिकाय” में अलग ही रंग नज़र आता है…..युवती सोनी और युवक मज़हर की बातचीत के कुछ अंश देखिए…….
“युवती पूरे दार्शनिक मूड में थी,उसने पूछा,”अच्छा मज़हर बताओ प्यार क्या है? क्या यह आकर्षण मात्र है?
“नहीं, आकर्षण क्षणभंगुर होता है।इसमें ह्रासमान तुष्टिगुण नियम काम करता है।”युवक ने जवाब दिया।
“क्या यह वात्सल्य है”युवती ने पूछा।
“नहीं,वात्सल्य में दया और दयालु का भाव होता है।। इसमें द्वैत का भाव है जबकि प्रेम अद्वैत है”युवक ने कहा।
“क्या ये श्रद्धा है?”युवती ने पूछा।
“नहीं ,श्रद्धा में गैरबराबरी का भाव होता है,इसमें एक छोटा एक बड़ा होता है जबकि प्रेम के प्रत्यय का आधार ही बराबरी है”युवक ने कहा।
“तो फिर आख़िर प्रेम है क्या?” युवती ने पूछा।
“प्रेम व्यक्ति के भीतर एक सक्रिय शक्ति का नाम है जो व्यक्ति और दुनिया के बीच की दीवार तोड़ डालती है,उसे दूसरों से जोड़ देती है”युवक ने अपना ज्ञान बघारा……
यहां प्रेम के नैतिक और आध्यात्मिक विवेचन से जातिगत भाव पीछे जाता दिखता है। इसी तरह मनोज कुमार पांडे की कहानी भी प्रेम के आधुनिक रंग की व्याख्या करती है,जहां धर्म, जाति और मानसिक विचार समय के विकास के साथ किस तरह बदलते जाते हैं।
इन सारी कहानियों को पढ़ते इस नतीजे पर पहुंची कि “प्रेम के आधुनिक भावबोध में, पुरातन का अभाव है,इसके कारण अनेकानेक हैं किंतु अब ठहराव,गंभीरता,प्रतीक्षा,धैर्य,स्वयं को दूसरे में विलीन करने की चाह समाप्त सी हो गई है। प्रेम भी लेनदेन सा हो चला किंतु फिर भी ये कटु सत्य है कि प्रेम गली अति सांकरी….
अच्छे-अच्छे विफल हो जाते हैं किंतु गली के उस पार यार का दीदार करने की अपूर्ण इच्छा लिए ही पराजित या नष्ट हो जाते हैं। इस गली में जाने के लिए “मैं”का चोला उतारना पड़ता है,तभी ये गली उस पार का अलौकिक आनंद प्रदान करती है।”

