व्यंग्यकार श्री दिलीप कुमार जी
मठ आबाद रहे मठाधीश आबाद रहे मठाधीशी जिंदाबाद
प्रश्न – हिंदी साहित्य के वर्तमान परिवेश में मठ और मठाधीशों की क्या स्थिति है ?
उत्तर- हिंदी साहित्य इस समय मठ और मठाधीशों के क्रमिक रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजर रहा है । कोरोना काल में यात्रा करने की बंदिशों के मद्देनजर कई मठ खाद पानी (परनिंदा ) के अभाव में ध्वस्त हो चुके हैं लेकिन उनके भग्नावेष यत्र-तत्र बिखरे पड़े हैं। इन मठों से निकले हुए चेले-चपाटे (सखियां -सहेलियां ) अभी भी इन मठों को महत्वपूर्ण, समीचीन और किले की भांति मजबूत मानते हैं, तथापि नए किलेदार ने सबसे मजबूत और मठों के प्रकाश स्तंभ माने जाने वाले मठ को प्राइवेट लिमिटेड घोषित कर दिया है और भारत के कम्पनी ला कानून के मुताबिक सौ -सौ रुपये के मानदेय पर लिखी गई रचनाओं को मठ की बौद्धिक सम्पत्ति मान लिया गया है । मठ के टीम लेखक (जिन्हें लोग गिरोह लेखक कहते हैं) इस प्राइवेट लिमिटेड को इसलिये अपनी सेवाएं देते हैं और खुद को साहित्य का सेक्युलर जीव और बौद्धिकता का लाइट हाउस मानते हैं। ये लोग अपने मठ से बाहर लिखने वाले लेखकों को कम्यूनल, संघी-कंघी लेखक कहकर खारिज करते हैं। इसी तर्ज पर आबाद किये गए बनारस,इलाहाबाद, भोपाल जैसे लघु मठ केंद्रों पर अतीत में लाइट हाउस मठ से प्रेरित गतिविधियों का संचालन होता रहा था, परन्तु प्रमुख मठाधीशों के काल-कवलित और बीमार होने के कारण इस मठ की गतिविधियां मंद पड़ गयी थीं। फिर कोरोना काल की दुश्वारियों ने मठ को ना सिर्फ खंडहर बना दिया बल्कि मठ को पदस्थापना भी अन्यत्र करनी पड़ी।
सो कुछ वर्षों पूर्व तक सुरा-सुंदरी की चर्चा से शुरू होकर चरित्र हनन का केंद बन जाने वाले अधिकांश मठों में वर्तमान में सिर्फ पढ़ाई -लिखाई और व्यापारिक कोलैबोरेशन की बातें होती हैं कि क्रांति के नाम पर इक्ट्ठा की गयी बौद्धिक सम्पति को इनकैश कैसे कराया जा सके। ध्यातव्य है कि लेखन की इस बौद्धिक संपदा के मानदेय का भुगतान साम्प्रदायिकता से लड़ने के नाम पर चंदा प्राप्त करके किया गया परन्तु अब ये बाजार में बिकने को रखे हैं।
स्वर,आडियो,वीडियो से लेकर प्रिंट तक, ये उस बकरे की तरह हैं जिसमें मांस, हड्डी तक बिक जाने के बाद उसकी खाल तक बेच दी जाती है । अतः विमर्श और मुक्ति के नाम पर संग्रहित समग्र सामग्री जो क्रांति करने के लिये इकट्ठा थी अब वैल्यू अनलाकिंग की प्रक्रिया में है, क्रांतिकारी लेखकों के तरकश के उधार में मिले तीर अब उनकी सन्तानों के बचत खाते में जाकर उनका भला कर रहे हैं।
प्रश्न – मठों की उपादेयता की विवेचना करें और विधाओं के प्रकाश में सन्दर्भ व्याख्या करें।
उत्तर – मठ आवश्यक हैं और मठाधीश भी, विधाएं बदलती रहती हैं। पहले अतुकांत कविता से क्रांति के प्रयास हुए, प्रयास सफल रहे । कविता सभी से कट गयी, जो लिखते हैं वो भी नहीं बता सकते कि उनकी कविता का मन्तव्य क्या है। कविता के बाद पाठकों की बारी कहानीकारों से त्रस्त होने की थी, इसमें सुबह से शाम तक क्या बीता टाइप के लेखन और सॉफ्ट पोर्न की लिपिबद्धता को देखा -भोगा यथार्थ मानकर कहानी का मुलम्मा पहनाया गया, ऐसे लेखक -लेखिकाओं की बहुत बड़ी कतार है, जिनसे पाठक न सिर्फ त्रस्त बल्कि पढ़ने को अभिशप्त हैं । अकहानी, नई कहानी जैसे पड़ावों से गुजरती अब ये तेरी मेरी कहानी बन गया है। सुरा-सुंदरी के इर्द -गिर्द बिताए गए समय को लिखकर मठों की जड़ों को मजबूत किया जाता है, होड़ है कि कौन किसकी पोल खोलेगा और कितनी छीछालेदर करेगा या करवाएगा।

