नागौर,राजस्थान
न लड़की हूँ,न लड़का हूँ,
इस सृष्टि कि एक सुन्दर रचना हूँ मै,
समाज की बंदिशों मे बंधी मै अर्धनारीश्वर का स्वरूप हूँ,
छक्का,हिजड़ा,किन्नर न जाने क्या-क्या मिले मुझे,
मै भी माँ की कोख से जन्मा हूँ फिर क्या दोष है मेरा,
मै भी हूँ इस समाज का एक हिस्सा
फिर क्यों बना दिया तुमने मुझे अभिशाप,
गुम सा हो गया है मेरा अस्तित्व इंसानों की भीड़ में,
मेरे अपने भी पराये हुये जान मेरे वजूद की हकीकत,
बजा-बजा के तालिया हैरान परेशान हो गये है हालात मेरे,
इस समाज के सवालो से परेशान,
आखिर कब तक छुपाये हम खुद का अस्तित्व,
न चाहते हुये भी दफन है हजारों ख्वाईशे मेरी,
उन गुमनाम गलियों में शर्मसार कर देते है मुझे समाज के सवाल,
क्या हो रहा मेरे जज्बातो के साथ,
बेमतलब निकल रहा मेरे सपनो का जनाजा,
मैं हूँ उस समाज की कहानी
जो कहने को उच्च विचारों वाला बनता है
देख मुझे मुँह फेर लेता है,
मैं हूँ दर्द, पीड़ा की कहानी,
लेकिन फिर भी हूँ मै बदनाम,
हर खुशी के मौके पे देती हूँ मै दुआएं हजार,
फिर भी मैं तिरस्कार की भागी बनती हूँ,
चेहरे पे बेहिसाब सूकून रखती हूँ,
मगर फिर भी खुद से अनजान रहती हूँ,
मेरे वजूद को तूने ताली तक सीमित कर दिया है,
आखिर क्यों ?
जिन पन्नो मे मेरे अस्तित्व को धिक्कारा जाता है,
उन पन्नो को मै फाड़ दूँ,
आजाद होकर मै खुद का वर्तमान लिख लूँ,
क्यों जन्म दिया तुमने मुझे ?
जब यह दूनियाँ मुझे फिजूल कहती है,
पेड़-पौधे,जीव -जन्तु कुछ भी बना देती क्यो बनाया प्राणी मुझे,
मात्र दिखावे के लिए तुम मेरे रक्षक बनते हो,
पीठ पीछे तो तुम मुझे हिजड़ा ही कहते हो,
जाहिर कर देते हो तुम वो सारे दर्द
जो मै दबा के रखती हूँ इस जालिम दूनियाँ से,
नही मानते तुम मुझे अपनी दुनिया का हिस्सा,
पर अब चाहिए मुझे अक्स मेरा सच्चा,
हाँ!हाँ एक किन्नर हूँ मैं,
इस समाज में बदनाम बेइज्जत हूँ मैं ,
लेकिन तुम सब की तरह स्वार्थ के लिए
अपनों को नहीं बेचा है मैने कभी,
हाँ मेरा कोई ठिकाना नही है,
लेकिन सबको दुआएं देती हूँ मै नि:स्वार्थ भाव से,
हाँ!हाँ मै एक किन्नर हूँ ।

