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अशरीरी निःस्वार्थ प्रेम- रासलीला

Posted on November 11, 2023

जय प्रकाश नारायण मिश्रा

प्रयागराज

श्रीकृष्ण का जीवन गूढतम विलक्षणता से भरा है जिसका अनुभव हमारी बुद्धि को नहीं हो पाता है। श्रीकृष्ण ने अपने चरित्र से जीवन का संदेश दिया है।

गोपी- श्रीकृष्ण रासलीला पर राजा परीक्षित को भी संदेह हुआ था । आज भी तथाकथित विद्वानों को भी रासलीला पर शंका है। परन्तु रासलीला ने भक्तिशास्त्र में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त किया है। बुद्धिमान आचार्य एवं आध्यात्मिक पुरुष, जिन्होंने श्रीकृष्ण-जीवन का सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया है, रासलीला-विवाद होने पर भी श्रीकृष्ण को परमब्रहम मानते हैं। अतः श्री कृष्ण – जीवन की भव्यता पहचानने हेतु गहरे पानी में उतरने की आवश्यकता है।

सामान्य जन को समझ है कि बिना स्वार्थ, आकर्षण या वासना के प्रेम संभव नहीं है। बिना व्यक्ति अथवा वस्तु के प्रेम हो ही नहीं सकता है। स्त्री पुरुष का प्रेम अशरीरी भी हो सकता है, बिना स्वार्थ के हो सकता है, इसकी कल्पना सामान्यजन को नहीं होती है। जिसे हम प्रेम समझते हैं वास्तव में वह स्वार्थ पर आधारित भूख है, वासना है जो उपभोग के बाद समाप्त हो जाती है अथवा उपभोग नहीं मिलने पर जीवन को नष्ट कर देती है। हम स्त्री- पुरुष की वासना को प्रेम का नाम देते हैं जो सत्य नहीं है।

श्रीकृष्ण ने जगत को समझाया कि व्यक्ति का व्यक्ति से या स्त्री व पुरुष का अशरीरी प्रेम संभव है। यही समझाने के लिए तथा वास्तविक प्रेम निःस्वार्थ भावना पर आधारित होता है, यह संदेश देने के लिए श्रीकृष्ण ने रासलीला का अभिनय गोपियों संग किया। गोपियों को सच्चे प्रेम का दर्शन कराकर उन्होंने उनका जीवन बदल दिया । श्रीकृष्ण ने कहा कि, ‘स्त्रियों को बदलकर संसार को बदला जा सकता है। श्रीकृष्ण गोपी के मध्य अशरीरी (Occult) आत्मिक प्रेम का प्रयोग ‘रासलीला’, आध्यात्मिक पुरुषों के लिए महान दिशानिर्देश है। रासलीला के समय कृष्ण की उम्र सात वर्ष थी। बड़े होने पर रासलीला प्रयोग करते तो लोग उनके चरित्र पर कीचड़ उछालते। भगवान ने यह कार्य अत्यन्त बुद्धिमतापूर्वदृष्टि से सम्पन्न किया।स्त्रियों को सुधार कर जगत को भगवान ने सुधारा।

हम श्रीकृष्ण के लिए क्या- क्या बोलते हैं ? यह सब भगवान को मालूम है। कंस भी कहता था कि कृष्ण तो स्त्रियों के मध्य बैठने वाला है। परन्तु जब श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण गोकुलवासियों का जीवन बदल दिया तभी से उन्हें “गोपीवल्लभ” (अर्थात गोपियों के (जिनके जीवन पवित्र हो गये थे) स्वामी) पदवी से पुकारते हैं।

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