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कविता- आंगन में दीवार

Posted on October 10, 2023

© वरिष्ठ कवि जितेन्द्र मिश्र “काका”, मऊ

खड़ा कर दिया मतभेदों नें,

आंगन में दीवार।

फीकी फीकी रही दिवाली,

होली अबकी बार।

दिया अभावों नें अक्सर ही,

नफरत की सौगातें।

कब क्यों कैसे बड़ी हो गई,

छोटी छोटी बातें।

टूट गया संवाद आपसी ,

हुआ प्रेम लाचार

बाँट लिए घर खेती बारी,

गहना बर्तन सारा।

होने लगा बीच में अब तो

रिश्तो का बंटवारा

कुटिल चाल की भेंट चढ़ गया,

अम्मा का उपचार।

सुख शांति सद्भाव के लिए

क्या-क्या यत्न किये

आंगन में तुलसी चौरा पर,

मां ने रखे दिये।

घर के मंदिर सम्मुख छुप छुप

रोई कितनी बार

फीकी फीकी रही दिवाली

होली अबकी बार।

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