वैष्णवी श्री, बांसुरीवादिका

संगीत विद्यार्थी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
भारत की सांस्कृतिक पहचान यहाँ की महान शिल्प और स्थापत्य कला है जिसने मानव जगत को एक से बढ़कर एक अप्रतिम और अनन्य धरोहर दिए हैं भारतीय संस्कृति की भव्यता यहाँ के प्राचीन मंदिरों की दीवालों पर मानो अनंतकाल के लिए उकेरी गयी हो ऐसा ही एक अतिभव्य और शानदार मंदिर ओडिशा के पुरी शहर से लगभग 35 किलोमीटर (22 मील) उत्तर-पूर्व राजा नरसिम्हादेव प्रथम द्वारा तेरहवीं सदी में निर्मित कोणार्क सूर्य मंदिर है ।

लगभग 12 एकड़ में फैले कोणार्क मंदिर को बनाने में 1,200 शिल्पकारों ने लगभग बारह साल तक मेहनत की थी। सन 1250 ई. में इस सूर्य मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ था।
कोणार्क सूर्य मंदिर की दीवारों पर कलिंगा वास्तुकला एवं शिल्पकला का अप्रतिम स्वरूप देखने को मिलता है। मंदिर की दीवारों पर फूल, बेल, ज्यामितीय आकृतियों की नक्काशी की गयी है। इसके अलावा मानव, गंधर्व, देव, किन्नर, पशु, रथ, चक्र, विभिन्न प्रकार के वाद्य यंत्रों आदि की भी आकृतियाँ निर्मित हैं।
कोणार्क मंदिर की दीवारों पर संगीत के प्राचीन अस्तित्व के कई प्रमाण देखने को मिलते हैं। भारतीय संगीत का अभिप्राय गायन, वादन और नृत्य तीनों से ही है। मंदिर की दीवारों पर विभिन्न प्रकार के वाद्य यन्त्रों की तथा नृत्य की नक्काशी देखने को मिलती है। सबसे रोचक एवं आश्चर्यजनक बात यह है कि सभी मूर्तियों में नृत्य एवं वाद्य यंत्रों का प्रदर्शन स्त्रियों द्वारा ही दिखाया गया है।

शारंगदेव कृत “संगीत रत्नाकर” में वाद्यों के चार प्रकार बताये गए हैं। वाद्य यन्त्रों के चारों प्रकार निम्नलिखित हैं-
1. तत् वाद्य – तार पर आघात द्वारा ध्वनि उत्पन्न करने वाले वाद्य,
2. सुषिर वाद्य – वायु द्वारा ध्वनि उत्पन्न करने वाले वाद्य,
3. अवनद्ध वाद्य- चमड़े पर आघात द्वारा ध्वनि उत्पन्न करने वाले वाद्य
4. घन वाद्य धातु के टकराव से ध्वनि उत्पन्न करने – वाले वाद्य
कोणार्क मंदिर की दीवारों पर उपरोक्त वाद्यों के सभी प्रकार (जैसे वीणा, शंख, बांसुरी, मर्दाला मंजीरा – आदि) की वादिकाओं तथा नृत्यांगनाओं की नक्काशी दीवारों पर देखने को मिलती हैं।
संगीत की विद्यार्थी होने के कारण मेरी कोणार्क यात्रा इन अद्भुत मूर्तियों पर टिक कर रह गयी। इन्हें देखने भर से मन में जो रोमांच हुआ उसने भारतीय संगीत और संस्कृति के प्रति मेरी आस्था को और भी अधिक दृढ आधार दिया ।

