डॉ. धनञ्जय शर्मा
असि.प्रोफेसर, एस.पी.जी. कॉलेज
घोसी, मऊ, उत्तर प्रदेश
धमाकों से पहले…..
चलने लगते हैं मन में कई धमाके
फैलने लगते हैं बारूदी गंध में
डर के धुंध
ओझल होने लगती है
फूलों की महक
चिड़ियों की चहक
बाल मन की किलकारियां आदि
धमाकों के बीच ….
चिराग नहीं जलते
धमाकों के बीच चूल्हा नहीं जलते
धमाकों के बीच स्कूल नहीं चलते
जब चिराग नहीं जलता
चूल्हा नहीं जलता
स्कूल नहीं खुलता
तो बस्तियां बन जाती है खंडहर ।
और धमाकों के बाद………
बिखर जाता है स्कूल का बस्ता
उड़ने लगते है प्रेम के परखच्चे
छा जाते हैं नफरत के बादल
बरसते है बारूद के गोले
रक्त से गीली हो जाती है धरती।


