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कविता – परछाईं

Posted on July 4, 2026

आनंद विक्रम सिंह

मऊ, उत्तर प्रदेश

तुम्हारी परछाईं  

अब भी

कमरे की दीवार पर उतर आती है,

जब शाम का सूरज खिड़की से गुज़रता है।

पर वो उजाला वैसा नहीं,

जैसा कभी तुम्हारा हाथ पकड़कर महसूस होता था।

चाय की प्याली में अब भी भाप उठती है,

पर उसकी महक में तुम्हारी हँसी घुली नहीं होती।

बरामदे की कुर्सी अब भी पड़ी है वहीं,

लेकिन उस पर बैठकर कोई बात नहीं होती

बस चुप्पी फैल जाती है,

जैसे धूल धीरे-धीरे फैलती है किताबों पर।

मैं उलझा नहीं हूँ तुम्हारे बारे में,

मैं बस खुद को सुलझा रहा हूँ।

जैसे पुराने संदूक से कपड़े निकालकर

अलग करता हूँ – कौन-सा रखना है, कौन-सा छोड़ना।

तुम उस संदूक में रखी रेशमी साड़ी-सी हो

जिसे फेंका नहीं जाता,

सिर्फ़ तह करके फिर से रख दिया जाता है।

हम अजनबी नहीं हुए,

पर पहले जैसे भी नहीं रहे।

कुछ वैसे ही जैसे बारिश के बाद का आकाश

जिसमें बादल बचे रहते हैं,

पर इंद्रधनुष आने से पहले ही टूट जाता है।

तुम अब मेरे पास नहीं हो,

पर दूर भी नहीं।

एक ख़ामोश गीत की तरह हो

जिसकी धुन कानों में नहीं,

दिल की तहों में बजती रहती है।

ना कोई शिक़ायत है,

ना कोई अदावत

बस दिल पहले जैसा मुलायम नहीं रहा।

खिड़की पर रखी पुरानी किताब की तरह,

जिसके पन्नों से अब भी

थोड़ी-सी धूप झरती है,

थोड़ी-सी खुशबू अटकी रहती है।

बरामदे में रखा खाली झूला,

अब भी तुम्हारे वक़्त का इंतज़ार करता है,

हवा जब उसे हिलाती है

तो लगता है जैसे कोई चुपचाप गुज़र गया हो।

तुम अब उलझन नहीं हो मेरे लिए,

बस एक अधूरी पंक्ति हो,

जिसे मैं बार-बार पढ़ता हूँ

और हर बार अलग मायने मिल जाते हैं।

हम अजनबी भी नहीं हुए,

और पहले जैसे भी नहीं

कुछ वैसे ही जैसे बरसात के बाद

पेड़ की शाख़ पर लटका हुआ आख़िरी क़तरा

अगर टिक जाए तो सूरज में चमक उठता है,

गिर भी जाए तो ज़मीन में समा ही जाता है।

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