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कहानी – वो चिट्ठी

Posted on July 4, 2026

लेखिका – संजना सिंह

मऊ, उत्तर प्रदेश

बारिश की एक ठंडी शाम थी। सत्रह साल की निशा अपनी पुरानी अलमारी साफ़ कर रही थी। तभी उसे एक छोटा-सा डिब्बा मिला। डिब्बे में कुछ तस्वीरें, एक टूटी हुई घड़ी और एक चिट्ठी रखी थी। चिट्ठी पर लिखा था- “मेरी प्यारी निशा के लिए।” यह उसके पिता की लिखावट थी।

निशा के हाथ काँपने लगे। उसके पिता का कई साल पहले निधन हो चुका था। उसने धीरे-धीरे चिट्ठी खोली। चिट्ठी में लिखा था- “अगर तुम यह चिट्ठी पढ़ रही हो, तो शायद मैं तुम्हारे पास नहीं हूँ। मुझे पता है कि तुम्हें मेरी बहुत याद आती होगी। लेकिन एक बात हमेशा याद रखना- तुम कभी अकेली नहीं हो। जब भी तुम्हें लगे कि कोई तुम्हें नहीं समझता, आसमान की तरफ़ देखना। मैं उन तारों में कहीं न कहीं तुम्हारी मुस्कान देख रहा होऊँगा। बेटा, जिंदगी हमेशा आसान नहीं होगी। कुछ लोग साथ छोड़ देंगे, कुछ सपने टूट जाएंगे। लेकिन तुम हार मत मानना। मुझे तुम पर हमेशा गर्व रहेगा।”

निशा की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे याद आया कि बचपन में जब वह डर जाती थी, तो उसके पिता उसे कंधे पर बैठाकर कहते थे, “मेरी बेटी सबसे बहादुर है।” उसने चिट्ठी को सीने से लगा लिया। उसी समय उसकी माँ कमरे में आईं। निशा रोते हुए उनकी गोद में सिर रखकर बोली,”माँ, पापा आज भी मेरे साथ हैं ना?” माँ की आँखें भी भर आईं। उन्होंने निशा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “हाँ बेटा, जो लोग हमें सच्चे दिल से प्यार करते हैं, वे कभी पूरी तरह दूर नहीं जाते। वे हमारी यादों, हमारी बातों और हमारे हौसले में हमेशा ज़िंदा रहते हैं।”

उस रात निशा छत पर गई। आसमान में अनगिनत तारे चमक रहे थे। उसने मुस्कुराकर आसमान की ओर देखा और धीरे से कहा,”पापा, मैं ठीक हूँ। और मैं हार नहीं मानूँगी।” ऐसा लगा जैसे एक तारा बाकी तारों से थोड़ा ज़्यादा चमक उठा हो। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उन आँसुओं के साथ एक नई उम्मीद भी थी।

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